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Kalapani, the land of scripture is the frontier villages of India: officials – कालापानी, लिपुलेख की भूमि भारत के सीमांत गांवों की है: अधिकारी

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कालापानी, लिपुलेख की भूमि भारत के सीमांत गांवों की है: अधिकारी

नेपाली संसद के निचले सदन द्वारा नए नक्शे को मंजूरी दिए जाने पर भारत की ओर से तीव्र प्रतिक्रिया दी गई है.

खास बातें

  • भारत-नेपाल सीमा पर भारत की ओर स्थित गांवों के हैं
  • नेपाली संसद के निचले सदन द्वारा कल शनिवार को मंजूर दी गई
  • नेपाल के इस कदम पर भारत की तरफ से तीव्र प्रतिक्रिया हुई है

पिथौरागढ:

नेपाल के नए नक्शे में उनके भूभाग के रूप में दर्शाए गए उत्तराखंड के कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र पारंपरिक रूप से भारत-नेपाल सीमा पर भारत की ओर स्थित गांवों के हैं. नेपाली संसद के निचले सदन द्वारा कल शनिवार को मंजूर किए गए नए राजनीतिक मानचित्र में इन क्षेत्रों को अपने भूभाग के रूप में दिखाए जाने पर भारत की तरफ से तीव्र प्रतिक्रिया हुई है. यहां के एक अधिकारी ने भी हाल में कहा कि स्थानीय भूमि रिकार्ड भी यही बताते हैं कि कालापानी और लिपुलेख की भूमि भारत—नेपाल सीमा पर भारत की ओर स्थित दो गांवों के निवासियों की है. पिथौरागढ के धारचूला के उपजिलाधिकारी ए के शुक्ला ने जमीन के दस्तावेजों के हवाले से बताया कि भारत-नेपाल सीमा पर लिपुलेख, कालापानी और नाभीढांग की सारी जमीन पारंपरिक रूप से धारचूला के गर्बियांग और गुंजी गांवों के निवासियों की है.

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शुक्ला ने बताया, ‘कालापानी और नाभीढांग में 190 एकड से ज्यादा जमीन गर्बियांग के ग्रामीणों के नाम दर्ज है जबकि लिपुलेख दर्रे पर स्थित भूमि रिकार्डों में गुंजी गांव के निवासियों की साझा जमीन के रूप में दर्ज है.’ वार्षिक कैलाश-मानसरोवर यात्रा हर साल भारत-चीन सीमा पर लिपुलेख दर्रे के जरिए ही होती है. गर्बियांग के ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 1962 में भारत चीन युद्ध से पहले उनके पूर्वज कालापानी में इसी जमीन पर फसलें उगाया करते थे. बाद में युद्ध के पश्चात लिपुलेख दर्रे के जरिए चीन के साथ सीमा व्यापार बंद हो गया और वहां फसलें उगाना भी छोड दिया गया.

गर्बियांग गांव के निवासी और धारचूला में रंग कल्याण संस्था के अध्यक्ष कृष्णा गर्बियाल ने बताया कि 1962 से पहले हम कालापानी और नाभीढांग में पाल्थी और फाफर जैसे स्थानीय अनाज उगाया करते थे.’ उन्होंने बताया कि पहले कालापानी के पार नेपाल में माउंट आपी तक की जमीन गर्बियांग के ग्रामीणों की ही थी लेकिन नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1816 में हुई सुगौली संधि के बाद उन्होंने इसे छोड दिया. इस संधि के बाद नेपाल और भारत के बीच स्थित काली नदी को सीमा रेखा मान लिया गया. उन्होंने बताया कि गर्बियांग के ग्रामीण कालापानी में काली नदी के स्रोत को बहुत पवित्र मानते हैं और उसमें अपने मृतकों की अस्थियों को प्रवाहित करते हैं.

नेपाल की प्रतिनिधि सभा में सभी दलों ने शनिवार को उस नए मानचित्र के पक्ष में वोट दिया जिसमें भारत की सीमा के साथ लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर दावा किया गया है. इस पर कडी प्रतिक्रिया देते हुए भारत ने नेपाल के नए नक्शे को खारिज कर दिया और इस दावे को तर्कहीन बताया. विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि नक्शे पर कृत्रिम तरीके से किया गया ऐसा क्षेत्र विस्तार न तो ऐतिहासिक तथ्यों या साक्ष्यों पर आधारित है और न ही तार्किक है. उन्होंने कहा कि यह सीमा मसलों के समाधान के लिए बनी आपसी समझ के भी खिलाफ है.

 

VIDEO: नेपाल: विवादित नक्शे को मंज़ूरी

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)


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