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कोरोना पॉलिसी देकर पैसा देने से मना कर रहीं बीमा कंपनियां, एक्‍सपर्ट बोले-करें ये काम

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कई बीमा कंपनियां कोरोना को लेकर इंश्‍योरेंस पॉलिसी दे रही हैं, हालांकि कोरोना पॉलिसीज में क्‍लेम न मिलने के मामले सामने आ रहे हैं.

कई बीमा कंपनियां कोरोना को लेकर इंश्‍योरेंस पॉलिसी दे रही हैं, हालांकि कोरोना पॉलिसीज में क्‍लेम न मिलने के मामले सामने आ रहे हैं.

कोरोना बीमारी के लिए अगर आपने भी किसी कंपनी से मेडिकल पॉलिसी ली है और आपकी कंपनी भी क्‍लेम देने से मना कर रही है तो आप इसकी शिकायत कर सकते हैं. उपभोक्‍ता मामलों की जानकार कंज्‍यूमर फॉरम की रिटायर्ड जज डॉ. प्रेमलता इसकी जानकारी दे रही हैं.

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    January 23, 2021, 4:14 PM IST

नई दिल्‍ली. कोरोना महामारी के साथ-साथ देश में कई और भी परेशानियां सामने आ रही हैं. लंबी अवधि की इस बीमारी में अस्‍पतालों की सुविधा और पैसे के खर्च को देखते हुए जहां लोगों में चिंता थी वहीं इसे भुनाने का काम बीमा कंपनियों (Insurance Companies) ने किया. देश में कई बीमा कंपनियां अन्‍य मेडिकल पॉलिसीज (Medical policies) से अलग कोरोना बचाव, कोरोना रक्षक पॉलिसी (Corona Rakshak policy) ले आईं. लोगों ने भी इन पॉलिसीज को हाथों-हाथ लिया. हालांकि कोरोना पॉलिसी लेने के बाद अब बीमा कंपनियों की ओर से क्‍लेम रिजेक्‍ट करने के मामले भी सामने आ रहे हैं जिससे पॉलिसी धारकों की परेशानियां बढ़ गई हैं. हालांकि उपभोक्‍ता मामलों (Consumer Affairs) के विशेषज्ञ का कहना है कि इससे घबराने के बजाय शिकायत करें. आपको आपका क्‍लेम (Claim) भी मिलेगा और मुआवजा भी.

कंज्‍यूमर फॉरम की रिटायर्ड जज डॉ. प्रेमलता बताती हैं कि उनके द्वारा चलाए जा रहे कंज्‍यूमर अवेकनिंग मिशन (Consumer Awakening Mission) के दौरान कई लोगों ने उनसे कोरोना पॉलिसीज को लेकर शिकायतें दी हैं. पिछले साल इस बीमारी के आने के बाद कंपनियों ने कोरोना से बचाव के लिए मेडिकल पॉलिसीज जारी कीं. लंबी अवधि तक चली इस बीमारी को देखते हुए और 14 दिनों के लंबे पीरियड तक क्‍वेरेंटीन रहने या अस्‍पताल में इलाज कराने की अनिवार्यता को देखते हुए लोगों ने कोरोना रक्षक पॉलिसीज लीं लेकिन कोरोना होने के बाद कई मामलों में इंश्‍योरेंस देने वाली कंपनियों ने मरीजों के क्‍लेम रिजेक्‍ट कर दिए. अब अस्‍पतालों का भारी-भरकम बिल बन जाने के बाद लोग बीमा के पैसे के लिए कंपनियों के चक्‍कर काट रहे हैं.

डॉ. प्रेमलता कहती हैं कि ऐसे मामलों में कंपनियों की ओर से कोरोना मेडिकल पॉलिसीज लेने वालों से कहा जा रहा है कि कम लक्षणों के बावजूद वे अस्‍पताल में भर्ती क्‍यों हुए जबकि इमरजैंसी नहीं थी. वे लोग घर में क्‍वेरेंटीन भी रह सकते थे. हालांकि पॉलिसी में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि लक्षणों के आधार पर बीमा का पैसा देना या न देना तय किया जाएगा. ऐसा अमूमन किसी पॉलिसी में होता भी नहीं है. अगर अस्‍पताल में भर्ती होने के सभी कागज हैं और इलाज के सभी जरूरी कागजात हैं तो कंपनियों को क्‍लेम का पैसा देना चाहिए. नए उपभोक्‍ता संरक्षण कानून 2019 ने अब उपभोक्‍ताओं के  लिए और भी सहूलियतें कर दी हैं. ऐसे में घबराने के बजाय आगे की कार्रवाई करनी चाहिए.

वे कहती हैं कि बीमा कंपनियों से मेडिकल पॉलिसी लेने के बाद क्‍लेम का पैसा लेना आपका हक है. कोई भी इंश्‍योरेंस कंपनी ये कैसे तय कर सकती है कि आपको कोरोना होने पर अस्‍पताल की जरूरत थी या नहीं, ये तो अस्‍पताल और डॉक्‍टर ही तय करेंगे. ऐसे में आप कंज्‍यूमर कमीशन में कंपनी के खिलाफ अपनी अपील डाल सकते हैं. इसके लिए ऑनलाइन भी शिकायत करने की सुविधा है. हालांकि केस शुरू होने के बाद जब कंज्‍यूमर कोर्ट आपको बुलाएगा तो आपको शारीरिक रूप से वहां मौजूद होना होगा. इसके बाद कोर्ट इस मामले में कंपनी से जवाब लेगा और व्‍यक्ति को न्‍याय दिलाएगा.







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